महा सम्मेलन
“क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?”
अक्टूबर 2025 महा सम्मेलन


11:42

“क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?”

यदि हम परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दिखाना चाहते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि वह हमारे प्रेम को कैसे पहचानता है।

उड़ाऊ पुत्र के दृष्टांत में, जब उसका छोटा भाई कुछ गलत फैसले लेने और “कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ाने” के बाद घर लौटा, तो बड़े भाई को आरंभ में आनंद मनाने में कठिनाई हुई।” बड़े भाई के घमंड और आत्म-धार्मिकता ने उसे अपने भाई की पश्चातापी घर वापस लौटने के आनंद को स्वीकार करने से रोका था। हम भी अपने प्रियजनों को अपने शब्दों और कार्यों के द्वारा अपने सच्चे प्रेम का एहसास कराए बिना ऐसे अवसरों को गंवा सकते हैं।

पवित्र शास्त्र में साझा किए गए और प्राप्त किए गए सच्चे प्रेम के कई शक्तिशाली उदाहरण हैं: नाओमी और रूत, अम्मोन और राजा लमोनी, उड़ाऊ पुत्र और उसका पिता, उद्धारकर्ता और उसके शिष्य।

जब प्रेम मुक्त भाव से दिया जाता और ईमानदारी से ग्रहण किया जाता है, तो देने वाले और पाने वाले दोनों के बीच प्रेम में वृद्धि के साथ एक सकारात्मक क्रिया आरंभ होती है।

परमेश्वर का प्रेम परिपूर्ण, अनंत, स्थायी, और बहुत “मीठा फल”है। यह आत्मा को “महान आनंद से परिपूर्ण” करता है। फिर भी, कभी-कभी अपने जीवन में परमेश्वर के प्रेम को पहचानना हमें कठिन लग सकता है। हालांकि, परिपूर्ण प्रेम करने वाला हमारा स्वर्गीय पिता इतनी गहराई से चाहता है कि हम उसके प्रेम का अनुभव करें कि वह “[हमारी] समझ के अनुसार [हमसे] बात करता है।” वह हमारे प्रति अपने प्रेम को उन तरीकों से व्यक्त करेगा, जिन्हें हम, व्यक्तिगत रूप से पहचान सकते हैं। हम अपने प्रति परमेश्वर के प्रेम का अनुभव कर सकते हैं जब हम प्रकृति की सुंदरता को देखते, या प्रार्थनाओं का उत्तर पाते, या आवश्यकता के समय विचार हमारे मन में आते, या आनंद के मधुर क्षणों का अनुभव करते हैं। हमारे प्रति स्वर्गीय पिता के प्रेम की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति वह है जो मन और हृदय दोनों में सुनाई देती है जब उसने अपने प्रिय पुत्र को प्रायश्चितकर्ता के रूप में स्वयं को अर्पित करने की अनुमति दी।

उड़ाऊ बेटे के बड़े भाई की तरह, हमारा ध्यान अक्सर स्वयं पर ही केंद्रित रहता है। हम अपनेप्रति परमेश्वर के प्रेम का प्रमाण खोजने में बहुत व्यस्त हो जाते हैं, और जब हमें वह नजर नहीं आता तो हम निराश हो जाते हैं। लेकिन सुंदर विरोधाभास यह है कि जितना अधिक हम परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को दिखाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उतनी ही आसानी से हम अपने प्रति उसके प्रेम को पहचानते हैं। शायद यही कारण है कि उद्धारकर्ता ने “सबसे बड़ी आज्ञा कौन सी है?” प्रश्न का उत्तर, इस सरल और महत्वपूर्ण आमंत्रण से दिया: “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखना।”

कभी-कभी हम अपने प्रिय लोगों के प्रति जिस तरह से प्रेम प्रदर्शित करते हैं, जरूरी नहीं कि वे भी उसी तरह से प्रेम को पहचानते हैं। यह देने वाले और पाने वाले दोनों के लिए निराशाजनक हो सकता है। जिनसे हम प्रेम करते हैं उनसे यह पूछना उपयोगी हो सकता है कि वे हमारे प्रेम को किस प्रकार पहचानते हैं। इसी तरह, यदि हम परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दिखाना चाहते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि वह हमारे प्रेम को कैसे पहचानता है। सौभाग्य से, उसने पवित्र शास्त्रों में कई तरीके स्पष्ट रूप से बताए हैं जिनसे हम उसके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकते हैं।

क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?

तिबिरियास झील पर पतरस और पुनर्जीवित प्रभु के बीच महत्वपूर्ण बातचीत में, हम उन तरीकों के बारे में सीखते हैं जिनसे हम प्रभु के प्रति अपना प्रेम दिखा सकते हैं।

“यीशु ने शमौन पतरस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उस से कहा, हां प्रभु तू तो जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं।”

प्रभु द्वारा पूछा गया मुख्य प्रश्न है “क्या तू इनसे अधिकमुझसे प्रेम रखता है?” हम प्रभु के प्रति अपना प्रेम तब प्रदर्शित करते हैं जब हम उसे “इनसे” ऊपर रखते हैं, और “ये” कोई व्यक्ति, कोई गतिविधि या कोई बात हो सकती है जो उन्हें हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव से हटा देती है।

एक दिन, एक सप्ताह, एक महीने या एक वर्ष में कभी भी इतना समय नहीं होगा कि हम वह सब कर सकें जो हम करना चाहते हैं या करना चाहिए। नश्वरता की परीक्षा का एक हिस्सा यह है कि समय के बहुमूल्य संसाधन का उपयोग हमारी अनंत भलाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातों के लिए किया जाए और उन बातों को छोड़ दिया जाए जो कम महत्वपूर्ण हैं।

अध्यक्ष रसल एम. नेल्सन ने कहा था: “हम में से प्रत्येक के लिए प्रश्न एक ही है।… क्या आप अपने जीवन में परमेश्वर को सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव होने के लिए तैयार हैं? क्या आप चाहेंगे कि, उसके वचन, उसकी आज्ञाएं, और उसके अनुबंध आपके के प्रत्येक कार्य को प्रभावित करें? क्या आप अनुमति देंगे कि उसकी वाणी को किसी भी अन्य से अधिक प्राथमिकता दी जाए? क्या आप चाहते हैं कि वह जो कुछ भी आप से कार्य करने को कहता है वह आपके लिए पहली प्राथमिकता होगी? क्या आप चाहते हैं कि आपकी इच्छा उसकी इच्छा में पूरी हो?” जब हम परमेश्वर को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाते हैं, तो हम उसके प्रति अपना शिष्यत्व और प्रेम प्रदर्शित करते हैं।

मेरी भेड़ों को चरा

पतरस और उद्धारकर्ता के बीच इसी बातचीत के अगले पद में, हम एक और तरीके के बारे में सीखते हैं जिससे प्रभु हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति को पहचानता है: “[प्रभु] ने दूसरी बार उससे कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है? उस से कहा, हे प्रभु, तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं। उस ने उस से कहा, मेरी भेड़ों को चरा।”

हम स्वर्गीय पिता के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करते हैं जब हम उसकी संतानों की सेवा करते, बात सुनते, प्रेम, या उत्थान करते हैं। यह सेवा उतनी ही सरल हो सकती है, जितना कि दूसरों को बिना अलोचना किए देखनासिद्धांत और अनुबंध के 76वें खंड में, हमें उन लोगों के चरित्र की झलक मिलती है जो सिलेस्टियल महिमा के उत्तराधिकारी होंगे: “वे देखते हैं जैसे वे दिखती हैं, और जानते हैं जैसे वे जानी जाती हैं।” वे दूसरों को वैसे ही देखते हैं जैसे परमेश्वर उन्हें देखता है, और परमेश्वर उन्हें वैसे ही देखता है जैसे वे बन सकते हैं, शानदार दिव्य क्षमता के साथ।

अपने मिशन से घर लौटने के बाद, मैंने बगीचे के रख-रखाव का व्यवसाय किया, जिसे मैंने और मेरे भाइयों ने किशोरावस्था में आरंभ किया था। मैं अपनी विश्वविद्यालय की पढ़ाई में भी व्यस्त था। एक वसंत सप्ताह में, भारी बारिश और अंतिम परीक्षाओं के कारण मैं परेशान था और मैं बगीचे के काम को समय पर नहीं कर पाया।

सप्ताह के मध्य में आसमान साफ ​​हो गया और मैंने कक्षाओं के बाद बगीचे का काम को पूरा करने की योजना बनाई। लेकिन जब मैं घर पहुंचा, तो मेरी गाड़ी और उपकरण गायब थे। उत्सुकतावश, मैंने मुझे सौंपे गए बगीचों का दौरा किया; प्रत्येक बगीचा पहले से ही सुन्दर ढंग से सजाया गया था। इन में आखिरी बगीचे पर मैंने अपने छोटे भाई को घास काटने वाली मशीन को चलाते हुए देखा था। उसने मुझे देखा, मुस्कुराया और हाथ हिलाया। कृतज्ञता से अभिभूत होकर मैंने उसे गले लगा लिया और धन्यवाद दिया। उसकी अर्थपूर्ण सेवा ने उसके प्रति मेरे प्रेम और निष्ठा को और अधिक मजबूत कर दिया। एक दूसरे की सेवा करना परमेश्वर और उसके प्रिय पुत्र के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का एक अचूक तरीका है।

सब बातों में उसका हाथ स्वीकार करो

हम कृतज्ञ हृदय रखकर भी परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम प्रकट करते हैं। प्रभु ने कहा, “मनुष्य किसी भी कार्य से परमेश्वर का अपमान नहीं करता, … सिवाय उनके जो सभी कार्यों में उसके हाथ को स्वीकार नहीं करते।” हम परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम इस बात को स्वीकार करके प्रदर्शित करते हैं कि वह हमारे जीवन की हर अच्छी बात का स्रोत है।

कंपनी शुरू करने के शुरुआती दिनों में, मैं और मेरा व्यापारिक साझेदार महत्वपूर्ण मुलाकातों से पहले ईमानदारी से प्रार्थना करते और स्वर्गीय पिता से मदद मांगते थे। बार-बार, परमेश्वर ने हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया, और हमारी मुलाकातें अच्छी रही थी। एक मुलाकात के बाद, मेरे व्यापारिक साझेदार ने बताया कि हम मदद मांगने में तो तत्पर थे, लेकिन धन्यवाद देने में धीमे थे। तब से, हमने अपनी सफलताओं में प्रभु के हाथ को पहचानते हुए, कृतज्ञता की सच्ची प्रार्थना करने की आदत बना ली। हम परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम “कृतज्ञता के भाव” से दिखाते हैं।”

यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानो

स्वर्गीय पिता और उसके प्रिय पुत्र के प्रति अपना प्रेम दिखाने का एक और तरीका उनकी आज्ञा मानना है। उद्धारकर्ता ने कहा था, “यदि तुम मुझ से प्रेम करते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानो।” इस प्रकार की आज्ञाकारिता न तो अंधी है और न ही अनिवार्य है, बल्कि यह प्रेम की सच्ची और स्वेच्छापूर्ण अभिव्यक्ति है। स्वर्ग में पिता चाहता है कि हम आज्ञाकारी बनें। बहन तमारा डब्ल्यू. रुनिया ने इसे “स्नेही आज्ञाकारिता” कहा। उन्होंने कहा, “यद्यपि अभीतक हममें पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं है, फिर भी हम अबस्नेहपूर्ण आज्ञाकारिता का प्रयास करते हैं, तथा बार-बार उसके साथ रहने का चुनाव करते हैं, क्योंकि हम उससे प्रेम करते हैं।”

स्वर्गीय पिता ने हमें उसे चुनने के लिए प्रेरित करने की शक्ति दी है। उसका कार्य और महिमा न केवल हमारे अनन्त जीवन को कार्यान्वित करना है, बल्कि इसमें यह आशा भी शामिल है कि हमारी सबसे बड़ी इच्छा उसके पास वापस लौटना है। हालांकि, वह हमें कभी भी आज्ञा मानने के लिए मजबूर नहीं करेगा। स्तुतिगीत “Know This, That Every Soul Is Free,” में हम गाते हैं:

वह बुलाएगा, मनाएगा, सही दिशा दिखाएगा,

और बुद्धि, प्रेम और प्रकाश से आशीष देगा,

अनाम तरीकों से अच्छे और दयालु बनने के लिए,

लेकिन मानव मन पर कभी दबाव नहीं डालेगा।”

मिशन के मार्गदर्शकों के रूप में, मेरी पत्नी क्रिस्टीना, और मैं ऐसे कई प्रचारकों से प्रेरित हुए थे जिन्होंने आज्ञाकारी होना चुना, न केवल इसलिए कि यह एक प्रचारक आदर्श था, बल्कि इसलिए कि वे विनम्रतापूर्वक प्रभु का प्रतिनिधित्व करने का चुनाव करके उसके प्रति अपना प्रेम दिखाना चाहते थे।

एल्डर डेल जी. रेनलैंड ने कहा है, “पालन-पोषण करने का [उसका] लक्ष्य यह नहीं है कि उसके बच्चे सही काम करें बल्कि यह है कि उसके बच्चे सही काम करने का चुनाव करें और अंततः उसके समान बनें।” यदि वह मात्र चाहता कि हम आज्ञाकारी बनें, तो वह हमारे व्यवहार को प्रभावित करने के लिए तत्काल पुरस्कार और दंड का उपयोग करता।” हम परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दिखाते हैं जब हम उसकी आज्ञा मानने और अनुसरण करने का चुनाव करते हैं।

हमारा स्वर्गीय पिता और हमारा उद्धारकर्ता हमारे द्वारा उनके प्रति व्यक्त प्रेम को पहचानते हैं जब हम उन्हें अपने जीवन में प्रथम स्थान देते हैं, एक दूसरे की सेवा करते हैं, तो उनसे प्राप्त प्रत्येक आशीष को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते, तथा उनकी आज्ञा का पालन और उनका अनुसरण करने का चुनाव करते हैं।

मैं गवाही देता हूं कि हम में से प्रत्येक सचमुच में परमेश्वर की संतान है और वह हमसे परिपूर्ण प्रेम करता है। मैं गवाही देता हूं कि वह चाहता है कि हम उसके प्रेम को उन तरीकों से अनुभव करें जिन्हें हम पहचानते और समझते हैं। और सुंदर विरोधाभास यह है कि जब हम उसके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करेंगे तो हम उसके प्रेम को अधिक गहराई से अनुभव करेंगे। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।

विवरण

  1. लूका 15:13

  2. देखें रोमियों 8:35–39; Dale G. Renlund, “Experience God’s Love” (Brigham Young University devotional, 3 दिस. 2019–4), speeches.byu.edu; Russell M. Nelson, “Divine Love,” Liahona, Feb. 2023, 12–17।

  3. 1 नफी 8:11

  4. 1 नफी 8:12

  5. 2 नफी 31:3

  6. देखें यूहन्ना 3:16

  7. देखें 1 यूहन्ना 4:19

  8. मत्ती 22:36-37

  9. यद्यपि हम अपने कार्यों के माध्यम से परमेश्वर का प्रेम अर्जित नहीं करते, फिर भी वह हमारी प्रार्थनाओं को सुनकर, हमें आशीष देकर, तथा अपने प्रेम का अनुभव करने में हमारी सहायता करके, उसके प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति को स्वीकार करने के लिए उत्सुक रहता है।

  10. यूहन्ना 21:15

  11. “हमें अपने जीवन में हर बात में परमेश्वर को सबसे आगे रखना चाहिए। वह सर्वप्रथम होना चाहिए। …

    “जब हम परमेश्वर को प्रथम स्थान पर रखते हैं, तो अन्य सभी बातें अपने उचित स्थान पर आ जाती हैं या हमारे जीवन से बाहर हो जाती हैं। प्रभु के प्रति हमारा प्रेम हमारे स्नेह के दावों, हमारे समय की मांगों, हमारे हितों और हमारी प्राथमिकताओं के क्रम को नियंत्रित करेगा” (Teachings of Presidents of the Church: Ezra Taft Benson [2014], 40)। Dallin H. Oaks, “Good, Better, Best,” लियाहोना, नव. 2007, 104-8 भी देखें।

  12. रसल एम. नेल्सन,“परमेश्वर को विजयी होने दो“, लियाहोना, नवं.2020, 94।

  13. यहून्ना 21:16

  14. देखें मुसायाह 2:17

  15. सिद्धांत और अनुबंध 76:94

  16. सिद्धांत और अनुबंध 59:21

  17. देखें फिलेमोन 1:4-7

  18. Thomas B. Monson, “An Attitude of Gratitude,” Ensign, मई 1992, 54।

  19. यूहन्ना 14:15

  20. तमारा डब्ल्यू. रुनिया, “Your Repentance Doesn’t Burden Jesus Christ; It Brightens His Joy,” लियाहोना, मई 2025, 92।

  21. देखें 2 नफी 10:23-24; हिलामन 14:30-31

  22. देखें मूसा 1:39

  23. “Know This, That Every Soul Is Free,” Hymns, सं. 240।

  24. देखें मुसायाह 5:2-5

  25. Dale G. Renlund, “Choose You This Day,” लियाहोनानवं. 2018, 104.

  26. देखें Patrick Kearon, “Receive His Gift,” Liahona, मई 2025, 121–24।

  27. “अनंतकाल की पहली महान आज्ञा यह है कि हम परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करें— यह पहली महान आज्ञा है। लेकिन संपूर्ण अनंतकाल का पहला महान सच यह है कि परमेश्वर हम से अपने पूरे हृदय, पराक्रम, मन, और बल से प्रेम करता है” (“Tomorrow the Lord Will Do Wonders among You,” Liahona, मई 2016, 127)।

  28. हेसेड एक विशेष प्रकार का प्रेम और अनुग्रह है जिसको परमेश्वर उन लोगों के लिए महसूस करता है जो उसके साथ अनुबंध बनाते हैं। और बदले में हम भी उससे हेसेड रखते हैं।

    “क्योंकि परमेश्वर उन लोगों के प्रति हेसेड रखता है जिन्होंने उसके साथ अनुबंध बनाया है, और वह उनसे प्रेम करेगा। वह उनके साथ काम करना जारी रखेगा और उन्हें बदलने के अवसर प्रदान करेगा। जब वे पश्चाताप करेंगे वह उन्हें क्षमा करेगा। और यदि वे भटक जाते हैं, तो वह उन्हें अपने पास आने के लिए मार्ग खोजने में सहायता करेगा।

    “एक बार जब आपने और मैंने परमेश्वर के साथ अनुबंध बना लिया, तो उसके साथ हमारा संबंध हमारे अनुबंध से पहले की तुलना में बहुत अधिक निकट हो जाता है” (रसल एम. नेल्सन, “The Everlasting Covenant,” लियाहोना, अक्टू. 2022, 6)।